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<title>د لونګو دريڅې </title>
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<description>ادبي او فرهنګي وېبلاګ</description>
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<lastBuildDate>Sun, 20 Dec 2009 09:39:11 GMT</lastBuildDate>
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<title>كره كتنه: نثار؛ د مقاوم ادب سرلارى شاعر</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-270.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكوال:  صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#ff0000 size=3&gt;ادبي ګزارشي ليكنه: (۳۰)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=5&gt;نثار: د مقاوم ادب سرلارى شاعر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.baheer.com/anzorona/nesar1.bmp&quot; align=textTop border=0&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;په كابل كې د استوګن او نااستوګن شعر اصطلاح ګانې په ۱۳۶۸ لمريز كال كې، چې د وخت رژيم د خپلو مخالفو لوريو په وړاندې يو څه تمكين ته غاړه كېښوده او تر يوه بريده په دننه او بهر كې د افغان ليكوالو اړيكې سره نږدې شوې، رامنځته شوې دي. له هېواده بهر او دننه په هيواد كې يو شمېر كسانو بيا د دغو اصطلاح ګانو په وړاندې د جهادي او مقاومتي شعر اصطلاګانې كارولې. خو په دې بهير كې زموږ يو شمېر ادبپوهان دا هم وايي، چې موږ هيڅكله هم مقاومتي ادبيات نه درلودل. ځكه دغه ډول ادبيات د ملي او سراسري پاڅونونو او اوښتونونو په نتيجه كې منځته راځي. دغه ادب پوهان په دې نظر دي، چې په افغانستان كې له تېرو ديرشو كلونو راهيسې موږ يو ډول مقاوم ادب تجربه كړى دى، چې دغه ادب د ځان د ساتلو په خاطر او پرته له كوم ايديالوژيكي جريان او فكر نه د فرهنګي يرغل او شرايطو په وړاندې رامنځ ته شوى دى.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 20 Dec 2009 09:39:11 GMT</pubDate>
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<title>کره كتنه: محمديار، ژمن خو هنرمند شاعر</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-269.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#ff0000 size=3&gt;ادبي ګزارشي ليكنه( ۲۹)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=5&gt;محمديار؛ ژمن خو هنرمند شاعر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=5&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 254px; HEIGHT: 205px&quot; height=698 alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.benawa.com/images/uploads/Mohamadyar.JPG&quot; width=1024 align=textTop border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;د روان پښتو ادبي بهير يوه غوره ځانګړنه دا ده، چې زموږ ګڼ شاعران تر ډېره بريده ټولنيز مسايل، چې د وطن او ولس دردونه په كې نغښتي په ساده، بې تكلفه خو هنري انداز انځوروي او پخپله بڼه كې دا هغه ډول شاعري ده، چې ډېر ژر د ولس زړه ته لاره كوي. دا زموږ د بهير هغه شمېر ويناوال دي، چې شعر ته د مينې، درد او ښكلا د يو ګډ تركيب په مينه ګوري او په همدې مينه له مينې او عاطفې څخه ډك انځورونه زموږ مخې ته ږدي. عبدالاحمد محمديار يو له همدغو شاعرانو څخه دى، چې په همدې مينې او باور شاعري كوي: (( ښكلا، مينه او درد، چې كله په يوه نقطه كې تقاطع كوي، زما په نظر همدغه د تقاطع نقطه د شعر د الهام سرچينه ده.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;ښاغلى عبدالاحمد محمديار زموږ د روان ادبي بهير، هغه عاطفي شاعر دى، چې د شعر د نوم له اوريدو سره د مينې، ښكلا او درد احساس كوي او دغسې يو بيان كه ډېر عادي هم وي، شعر يې بولي: (( درد، مينه او ښكلا، چې له انسان سره ملګرى اوسي، زه فكر كومه كه چېرته هغه عادي هم وغږېږي، د هغه عادي غږېدل هم زموږ لپاره شعر دى.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 15 Dec 2009 09:46:44 GMT</pubDate>
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<dc:creator>lawang</dc:creator>
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<title>شعر: مینه</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-268.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ويناوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;مينه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;منم، چې مخته تر دې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ته، خوښېدې مې زياته&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;راته وې ګرانه ډېره&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;خو دا احساس مې كله كړى نه و&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;داسې مې هيڅكله ګڼلي نه وو&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;زړه مې دغسې درزېدلى نه و&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;كله يې هم داسې  خبرې رانه نه وې غوښتې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;***&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;پرون سهار كله همدا، چې ته مې ولېدلې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;د زړه درزا نه وايم &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;راته تر هروخت او ترچا اشنا&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ښكلې ښكاره شوې ډېره &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ما داسې ښكلې &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;كله لېدلې نه وې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ستا دا ښكلا او غوړېدلې څېرې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;شوه زلزله مې په بې حسه زړه كې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;دغسې ټوله ورځ ماښامه پورې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;زړه تخنولم، رانه خبرې غوښتې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;***&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ماښام ناڅاپه غوندې ځير شومه، چې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;بهر رڼا ده، هر څه سپين ښكارېږي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;هسك ته، چې ومې كتل&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;سپوږمۍ د څوارلسو وه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ما د سپوږمۍ څېره كې ته ولېدې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;زړه مې بيا وسكونډلم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;بيا يې خبرې غوښتې&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;***&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;خوب كې مې وليدل، چې &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;زه په رڼو اوبو كې ژوند كومه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;***&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;سهار، چې پاڅېدلم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;پوه نه شوم ولې يو دم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;زړه كې له تا سره مې &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;احساس د مينې وكړ.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;۱۳۸۸د ليندۍ ۱۳&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Fri, 11 Dec 2009 06:01:15 GMT</pubDate>
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<title>شعر: تازه غزل</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-267.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=right&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ويناوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=6&gt;غزل&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;راځه كه ګورې يې خوبوړې شپې دي &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;تيارو كــــې نغښتې اشنا ستړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;وې دې، راځم او بيا له هغې شپې نه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;خوب مې له سترګو ځينې وړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;زړه مې دې سيورى ته چې غواړم هميش&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;عشقه له غېږ مې دې راوړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;ارمانه ستا سودا اخيستى يمه&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;زما د ژوند ډېرې نيمګړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;منم كه سختې دي خوږې خو هم دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;د مينې غېږه كې مې كړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;په انتظار انتظار بدر دا ستا  &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;پخپلو اوښكو رڼې كړې شپې دي&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;۱۳۸۸،۹،۹&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 30 Nov 2009 05:24:56 GMT</pubDate>
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<item>
<title>کره کتنه: سعادت؛ فطري شاعر او د...</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-266.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكونكى: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;ادبي ګزارشي ليكنه (( ۲۸))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=5&gt;سعادت؛ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=5&gt;فطري شاعر او د سندريزو كلماتو رانغاړونكى&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.tolafghan.com/stuff/images/afy/p9080007.jpg&quot; align=textTop border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;&lt;I&gt;&lt;U&gt;يادونه:&lt;/U&gt;&lt;/I&gt;&lt;/B&gt;&lt;I&gt;&lt;U&gt; په ۱۳۸۳ لمريز كال كې، چې د كليد او مرسل اوونيزو ترڅنګه كليد راډيو هم په خپرونو پيل وكړ او په ډېره كمه موده كې، زيات اوريدونكي خپل كړل. ما دا له ځانه سره وپتېيله، چې زه هم د خپل ذوق او مينې له مخې په دغه راډيو كې يوه ادبي خپرونه پيل كړم. د راډيو ادارې دا راسره ومنله او ما د مرغومي په څوارلسمه د لونګو دريڅې په نامه، د پښتو د معاصر نظم و نثر او ښكلاوو د رابرسېره كولو لپاره يوه پنځه ويشت دقيقه يي ادبي خپرونې چمتو او له راډيو نه خپره كړه، چې يو زيات شمېر مينه والو او ادبپوهانو د دغې خپرونې دوام وركولو ته وهڅولم. &lt;/U&gt;&lt;/I&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;I&gt;&lt;U&gt;&lt;FONT size=3&gt;د لونګو دريڅې د لومړۍ خپرونې لپاره، ما د خپل درانه دوست او ورور ښاغلي اسدالله غضنفر تر سلا مشورې وروسته، د ښاغلي سعادت د شعرونو مطالعه پيل او له يو شمېر ادبپوهانو او شاعرانو سره مې د هغه د شعر و شاعرۍ پر فكري او ښكلاييز اړخ مركې وكړې او هغه خپرونه نشر شوه. &lt;/FONT&gt;&lt;/U&gt;&lt;/I&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 06:14:15 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>لنډه كيسه: چلنج</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-265.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكوال:  صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;چلنج&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://images-jp.amazon.com/images/P/B00008YJGC.09.LZZZZZZZ.jpg&quot; align=textTop border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;۱۳۸۸،۸،۲۳&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;د درېيم ځل لپاره مې د خپل مبايل د مسيج تڼۍ كېكاږله، چې ناجيې ته د خپل زړه خبره وليكم. دې سره يو ژور سوچ په مخه كړم. زړه نازړه شوم او له ځانه سره مې وويل: (( نه، نه! هغه راته ګرانه ده، د هغې كركه هم راته مينه ښكاري. نور نو نه شم كولى، ما خو دا نه ګڼله، چې هغه دې داسې راسره واخلي.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;دا فكر ځكه راسره پيدا شوى و، چې تېر وختونه او يادونه دغسې وو، چې هيچا هم دا نه ګڼله، چې زه او هغه په كوم شي سره وران شوو. ښه مې په يادېږي يوه ورځ ارين، چې زما او د هغې تر منځ ولاړه وه، ويې ويل: (( هغه به هم يوه ورځ وي، چې زه تاسې دواړه له يو بل نه خپه او په جنګ وګورم.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;ما هيڅ ونه ويل، خو ناجيې په كړس كړس وخندل او ويې ويل: (( ته به همداسې ارماني پاتې شې.)) &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;كه څه هم د ارينې دې خبرې يو څه اندېښنه غوندې راته پيدا كړې وه، خو د ناجيې خبرې مې زړه ته قوت وركړ. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 19 Nov 2009 05:49:15 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>کره كتنه: ازمون او د خپل وخت انځوريزه شاعري</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-264.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#ff0000 size=3&gt;اد بي ګزارشي ليكنه(۲۷)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=6&gt;ازمون &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=6&gt;او د خپل وخت انځوريزه شاعري&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 262px; HEIGHT: 301px&quot; height=401 alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.tolafghan.com/stuff/images/afy/dscn1961.jpg&quot; width=376 align=textTop border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;له مانيز او ښكلاييز پلوه د الفاظو او كلماتو غوره كول او يو له بل سره اوډل يې يوه ترټولو سخته مرحله ده. دا ځكه، چې په ښكلې او سندريزه بڼه د يو مفهوم افاده كول، د يوه شاعر پر شعري او پوره ذهني قوت دلالت كوي. د اندروني كيفياتو د بيان لپاره د داسې الفاظو غوره كول او يو له بل سره اوډل، چې پر عاطفي بار سربېره انځوريز خوند او رنګ ولري، د پښتو د معاصرې شاعرۍ يوه هغه غوره ځانګړنه ده، چې زموږ د ننني ادبي بهير يو كم شمېر شاعران ورته توجه كوي. يو له دغو كم شمېر ځوانو شاعرانو څخه ښاغلى استاد لعل پاچا ازمون دى. ازمون تل هڅه كوي، چې خپل اندروني كيفيات په همدې بڼه انځور كړي: (( د لومړي شعر په ليكلو سره، ما داسې ګمان كاوه، چې ګوندې ما خپله يوه وركه مينه پيدا كړې او ليدلې ده او په زړه كې مې، چې كوم درد او كومه څړيكه وه، هغه رابهر شوه.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 12:37:06 GMT</pubDate>
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<title>شعر: انتظار</title>
<link>http://lawang.blogfa.com/post-263.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=right&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ٌويناوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;انتظار&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;ته به راځې او كه نه څه ووايم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;سخت خو دې خوږ انتظار راسره دى&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;دا خو ته يې عشقه نه دې شته چې مرګ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;دا ګران راته ژوند تر دار راسره دى&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;۱۳۸۸،۸،۲۱&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 07:07:00 GMT</pubDate>
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<title>کره كتنه: اسمعيل يون، د ملي دريځ خاوند شاعر او ليكوال</title>
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<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;ليكوال: صديق الله بدر&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT style=&quot;BACKGROUND-COLOR: #ffffff&quot; color=#ff0000 size=3&gt;ادبي ګزارشي ليكنه (۲۶)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;اسمعيل يون؛ &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;د ملي دريځ خاوند شاعر او ليكوال&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff6600 size=6&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 256px; HEIGHT: 261px&quot; height=479 alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.rohi.af/weekpersonimage/yoon.JPG2.JPG&quot; width=314 align=textTop border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;شعر، د فكر او ښكلا زرين مزى دى. د ښه شعر او ښه شاعر پېژندګلوي په سندريزه بڼه د فكر او خيال غاړه غړى كول دي. كوم كلام، چې په دغو دوو ګاڼو پسولل شوى وي، هغه په رښتني معنى داسې يوه هستونه ده، چې په ښكلې بڼه يو پيغام لېږدوي. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;د پښتو د معاصرې شاعرۍ، يوه غوره ځانګړنه د فكر او خيال ترمنځ تناسب شتون او د دواړو موازې حركت دى. نننى پښتو شعري بهير د همدغې ځانګړنې د رامنځته كوونكو ګڼ استازي لري، چې يو په كې پوهنمل استاد محمد اسمعيل يون دى.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;يون د دغه بهير هغه استازى شاعر دى، چې په شعر كې د فكر او ښكلا پر تناسب ټينګار كوي او ورسره فكر د شعر روح ګڼي: (( فكر، چې په يو شعر كې نه وي، معنى يې دا ده، چې هغه شعر روح نه لري. هغه شعرونه، چې فكري تومنه ونه لري، د هغه بقا ناممكنه ده. البته دا هم بايد په نظر كې ونيول شي، چې د فكر تله دومره درنه نه شي، چې د شعر ښكلا ته زيان ورسوي او شعر په شعار بدل او هنري ارزښت يې راكم كړي.))&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Fri, 13 Nov 2009 05:35:15 GMT</pubDate>
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<title>لنډه كيسه: دريا نوش</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#00ff00 size=3&gt;نویسنده: صدیق الله بدر&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#ff9900 size=6&gt;دریا نوش&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;غرور، تمام وجود &quot;زرین&quot; را فراگرفته بود. قلبش لحظه به لحظه هوا می گرفت؛ میل نوشیدن و باز نوشیدنش دو چندان می شد و پیهم سگرت روشن می کرد. موتر پجرویش را که از نوع آخرین مودل آن بود، در گوشه اي بریک نمود و از سویچبورد موتر، بوتل کلانی را کشیده و زمزمه کنان با خود گفت: &quot;ناپلیون، ناپلیون! تتو کتی نودوشش مردارش! او هم خات گفت که بری زرین دوا دادیم، تتو ایره دوا میگن! تو کی دواره میشناسی؟&quot;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;  با این حال، زرین سر بوتل را باز کرد ولی قبل از آنکه لب به بوتل ببرد، دست چپش را در هوا دراز کرد و با خود گفت: &quot;نی! ناحق به او بیچاره تتو گفتم، دوایش کم کم اثر داره، چندان بود نبود؛ خو باز هم یک کمی دیگه.&quot; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 08 Nov 2009 07:18:15 GMT</pubDate>
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